Ashadha Purnima 2025: आषाढ़ पूर्णिमा आज, कब करें पूजा और दान? जानें शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

Akash Saharan
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Ashadha Purnima Vrat Shubh Muhurat - फोटो : adobe stock

नमस्कार! आप सभी को आने वाली आषाढ़ पूर्णिमा की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

इस 10 जुलाई को यह खास पूर्णिमा पड़ रही है, और क्या आप भी जानना चाहते हैं कि इस दिन पूजा और दान-पुण्य करने का सबसे सटीक और शुभ मुहूर्त कौन सा है? मन में उलझन है कि व्रत आखिर किस दिन रखें और स्नान-दान के लिए सबसे उत्तम समय कौन सा रहेगा?

तो आप बिल्कुल सही जगह पर हैं! इस वीडियो में हम न सिर्फ पंचांग के अनुसार आपको एकदम सही समय बताएंगे, बल्कि पूजा की वह सरल विधि भी समझाएंगे, जिससे भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की कृपा आप पर बरसे। साथ ही, हम इस दिन के गहरे धार्मिक महत्व को समझेंगे और जानेंगे वो छोटे-छोटे उपाय, जो आपके घर में सुख और समृद्धि ला सकते हैं। तो इस पूरी और महत्वपूर्ण जानकारी के लिए हमारे साथ अंत तक बने रहिएगा।

आषाढ़ पूर्णिमा का अनोखा महत्व

यूँ तो हर पूर्णिमा खास होती है, लेकिन शास्त्रों में आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को बहुत ही विशेष और पुण्य फल देने वाली माना गया है। इसकी कई वजहें हैं।

सबसे पहली और सबसे बड़ी वजह तो ये है कि इसी पवित्र तिथि को हम सब गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा के तौर पर मनाते हैं। ये दिन महर्षि वेदव्यास का जन्मदिन है, जिन्होंने हमें वेदों का ज्ञान दिया और महाभारत जैसा महान ग्रंथ रचा। यह दिन सिर्फ हमारे आध्यात्मिक गुरुओं का नहीं, बल्कि हमारे माता-पिता, शिक्षक और उन सभी लोगों का सम्मान करने का दिन है, जिन्होंने हमें जीवन में सही रास्ता दिखाया है।

इतना ही नहीं, आषाढ़ पूर्णिमा से ही पवित्र चातुर्मास की शुरुआत होती है। ये वो चार महीने हैं, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और सृष्टि के संचालन का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। यह समय तप, साधना और खुद को आध्यात्मिक रूप से निखारने के लिए सबसे उत्तम माना गया है।

इसके अलावा, यह दिन पितरों को याद करने और उनके तर्पण के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन किया गया श्राद्ध और दान पितरों की आत्मा को शांति देता है और उनका आशीर्वाद हमारे परिवार पर हमेशा बना रहता है।

और हाँ, एक और खास बात! यह दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा के लिए भी बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन सत्यनारायण भगवान का व्रत रखने और उनकी कथा सुनने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है।

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शुभ मुहूर्त: पूजा, स्नान और दान का सबसे सही समय

चलिए, अब आते हैं उस सबसे ज़रूरी बात पर, जिसका आपको इंतज़ार है – यानी कि शुभ मुहूर्त। क्योंकि किसी भी पूजा का पूरा फल तभी मिलता है, जब उसे सही समय पर किया जाए।

देखिए, हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2025 में पूर्णिमा तिथि 10 जुलाई को देर रात 1 बजकर 36 मिनट पर शुरू होगी और 11 जुलाई को देर रात 2 बजकर 6 मिनट पर खत्म होगी। अब सवाल उठता है कि व्रत किस दिन रखें? तो नियम यह कहता है कि जिस दिन सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि हो, उसी दिन पर्व मनाना चाहिए। इस हिसाब से आषाढ़ पूर्णिमा का व्रत और सारे अनुष्ठान 10 जुलाई, गुरुवार को ही किए जाएंगे।

आइए, अब दिन के सभी शुभ मुहूर्तों को एक-एक करके समझ लेते हैं:

  • ब्रह्म मुहूर्त: यह दिन का सबसे शुद्ध और पवित्र समय होता है। 10 जुलाई को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 10 मिनट से 4 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। इस समय में जागकर स्नान करना बहुत ही पुण्यकारी माना गया है।
  • स्नान-दान का शुभ मुहूर्त: पूर्णिमा पर पवित्र नदी में स्नान करने का बहुत महत्व है। अगर आप बाहर नहीं जा सकते, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर लें। स्नान और दान के लिए सुबह का पूरा समय ही बहुत अच्छा है।
  • पूजा का सर्वोत्तम समय: भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की पूजा के लिए सुबह 6 बजे से लेकर 11 बजकर 30 मिनट तक का समय सबसे शुभ रहेगा।
  • अभिजीत मुहूर्त: यह दिन का वो समय है, जब कोई भी शुभ काम बिना सोचे-समझे किया जा सकता है। यह मुहूर्त सुबह 11 बजकर 59 मिनट से दोपहर 12 बजकर 54 मिनट तक रहेगा।
  • चंद्रोदय का समय: पूर्णिमा की पूजा चाँद को अर्घ्य दिए बिना अधूरी है। नई दिल्ली के समय के हिसाब से, 10 जुलाई को चंद्रोदय शाम 7 बजकर 18 मिनट पर होगा। हाँ, एक बात का ध्यान रखिएगा कि आपके शहर के हिसाब से चंद्रोदय के समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है, तो उसे एक बार ज़रूर देख लें।

सरल और संपूर्ण पूजा विधि

अब जब आप शुभ मुहूर्त जान चुके हैं, तो चलिए पूजा की पूरी विधि को स्टेप-बाय-स्टेप समझते हैं।

सुबह की पूजा:

  • पवित्र स्नान और संकल्प: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, स्नान करें। हो सके तो पानी में थोड़ा गंगाजल और कुछ काले तिल डालकर नहाएं। इसके बाद साफ, पीले या सफेद कपड़े पहनें और हाथ में जल-अक्षत लेकर आषाढ़ पूर्णिमा व्रत का संकल्प लें।
  • सूर्य देव को अर्घ्य: तांबे के लोटे में जल, रोली, चावल और एक लाल फूल डालकर “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र बोलते हुए सूर्य भगवान को अर्घ्य दें।
  • पूजा की तैयारी: घर के मंदिर को अच्छे से साफ करें और एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर रखें। साथ में, गुरु पूर्णिमा होने के कारण महर्षि वेदव्यास जी की तस्वीर भी ज़रूर स्थापित करें।
  • विष्णु-लक्ष्मी पूजन: सबसे पहले गणेश जी का ध्यान करें। फिर भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें साफ जल से स्नान कराकर पीले वस्त्र पहनाएं। माँ लक्ष्मी को लाल वस्त्र अर्पित करें। भगवान विष्णु को पीला चंदन, जनेऊ, पीले फूल और तुलसी दल ज़रूर चढ़ाएं। माँ लक्ष्मी को कुमकुम, चावल, सिंदूर और लाल फूल अर्पित करें।
  • भोग लगाएं: भगवान को सात्विक चीजों का भोग लगाएं। इस दिन केसर और मखाने डालकर खीर बनाना सबसे अच्छा माना जाता है। भोग में पंचमेवा और मौसम के फल भी रखें। याद रखें, भगवान विष्णु के भोग में तुलसी दल रखना अनिवार्य है।
  • आरती और मंत्र जाप: धूप और घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की आरती गाएं। इसके बाद “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और “ॐ महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र की कम से कम एक माला (108 बार) जाप करें।

गुरु पूजन:

  • आज के दिन अपने गुरु की पूजा करना न भूलें। अगर आपके गुरु हैं, तो उनके पास जाकर आशीर्वाद लें और अपनी श्रद्धा अनुसार उन्हें कोई भेंट दें। अगर गुरु साथ नहीं हैं, तो उनके चित्र की पूजा करें। और जिनके कोई गुरु नहीं हैं, वे महर्षि वेदव्यास या भगवान दत्तात्रेय को अपना गुरु मानकर उनकी पूजा कर सकते हैं।

शाम की चंद्र पूजा:

  • शाम को जब चाँद निकल आए, तो उन्हें अर्घ्य देना बहुत ज़रूरी है। एक चांदी या स्टील के लोटे में कच्चा दूध, जल, चावल, शक्कर और सफेद फूल मिलाकर चाँद को देखते हुए “ॐ सों सोमाय नमः” मंत्र का जाप करते हुए अर्घ्य दें। माना जाता है कि इससे कुंडली का चंद्र दोष दूर होता है और मन को शांति मिलती है।

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दान का महत्व: क्या दान करें?

कहते हैं, आषाढ़ पूर्णिमा पर किया गया दान अक्षय होता है, यानी उसका पुण्य कभी खत्म नहीं होता।

  • अन्न दान: इस दिन चावल, आटा, घी और चीनी जैसी खाने की चीज़ें दान करना बहुत शुभ होता है। इससे घर में अन्न के भंडार हमेशा भरे रहते हैं।
  • वस्त्र दान: ज़रूरतमंद लोगों को कपड़ों का दान करने से बड़ा पुण्य मिलता है।
  • सफ़ेद चीज़ों का दान: चंद्रमा की कृपा पाने के लिए आज दूध, दही, सफेद कपड़े, मोती या चांदी का दान करना बहुत असरदार होता है।
  • तिल का दान: इस दिन काले तिल दान करने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है और शनि दोष में भी राहत मिलती है।
  • ज्ञान का दान: गुरु पूर्णिमा का दिन है, तो शिक्षा से जुड़ी चीज़ें जैसे किताबें, पेन, कॉपी आदि दान करना भी एक बहुत अच्छा काम है।

ऐसी मान्यता है कि इस दिन आप जो भी दान करते हैं, वो सीधे देवी-देवताओं तक पहुंचता है और आपके जीवन से दुर्भाग्य को हटाकर सुख-समृद्धि लाता है।

क्या करें और क्या न करें?

इस पवित्र दिन का पूरा लाभ पाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना भी ज़रूरी है।

क्या करें:

  • पूरे दिन सात्विक भोजन ही करें। अगर व्रत रखा है, तो फलाहार करें।
  • घर में लड़ाई-झगड़े से बचें और शांति का माहौल बनाए रखें।
  • जितना हो सके, भगवान का ध्यान और उनके मंत्रों का जाप करें।
  • अपने गुरुओं और घर के बड़ों का आदर करें और उनका आशीर्वाद लें।
  • हो सके तो सत्यनारायण भगवान की कथा पढ़ें या सुनें।

क्या न करें:

  • इस दिन भूलकर भी तामसिक भोजन, जैसे- मांस-मछली, शराब, प्याज-लहसुन का सेवन न करें।
  • किसी का अपमान न करें, किसी से झूठ न बोलें और किसी के लिए मन में बुरा भाव न लाएं।
  • मान्यता है कि इस दिन बाल और नाखून भी नहीं काटने चाहिए।

प्रेरक कथा: महर्षि वेदव्यास का जन्म

आइए, गुरु पूर्णिमा के इस सुंदर मौके पर सुनते हैं कि इस दिन के प्रणेता, महर्षि वेदव्यास का जन्म कैसे हुआ।

कहानी बहुत समय पहले की है। एक बार महर्षि पराशर यमुना नदी पार करना चाहते थे। उन्होंने नाव चला रही एक युवती, सत्यवती से मदद मांगी। सत्यवती के शरीर से मछली जैसी गंध आती थी, जिसके कारण वह हमेशा दुखी रहती थी। महर्षि पराशर ने अपने तपोबल से उसकी इस दुर्गंध को दिव्य सुगंध में बदल दिया और वह ‘योजनगंधा’ कहलाईं। सत्यवती के सेवा भाव से खुश होकर महर्षि ने उसे एक तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया।

समय आने पर, सत्यवती ने यमुना के एक द्वीप पर एक बालक को जन्म दिया। द्वीप पर पैदा होने की वजह से उनका नाम ‘द्वैपायन’ पड़ा और उनका रंग सांवला था, इसलिए वे ‘कृष्ण’ कहलाए। इस तरह उनका पूरा नाम हुआ कृष्ण द्वैपायन। बचपन से ही उनका मन ईश्वर में लगता था और वे तपस्या करने वन जाना चाहते थे। अपनी माँ से आज्ञा लेकर वे वन चले गए और कठोर तप किया।

तपस्या के बल पर उन्होंने वेदों का इतना गहरा ज्ञान प्राप्त कर लिया कि उस समय के लोगों की कम होती याददाश्त को देखते हुए, उन्होंने एक विशाल वेद को चार हिस्सों में बांटा – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों का यह ‘व्यास’ यानी विभाजन करने के कारण ही वे ‘वेदव्यास’ के नाम से दुनिया में जाने गए। उन्होंने ही 18 महापुराण, ब्रह्मसूत्र और महान ग्रंथ महाभारत की भी रचना की। इसी महान काम के सम्मान में उनके जन्मदिन को ‘व्यास पूर्णिमा’ या ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है।

कमेंट बॉक्स में “जय लक्ष्मी नारायण” या “जय गुरुदेव” ज़रूर लिखें। आप सभी को एक बार फिर से आषाढ़ पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ! आपका दिन मंगलमय हो! जय श्री हरि

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